जब धरती ने अपना अंगारा ठंडा कर लिया, और सूरज भी दूर जाता हुआ एक याद बन गया। तब नदियाँ रुक गईं, गुनगुनाना भूल गईं। पेड़ों ने अपनी छाल उतार दी, और हवा ने शब्द खो दिए।
और असली संघर्ष अब भी वही है: पिघलना, या पिघलाना। जीवित रहना, या सिर्फ़ सहना। यदि आप चाहें तो मैं इसी विषय पर कोई भी लिख सकता हूँ। बस संकेत दीजिए। ice age in hindi
यहाँ प्रस्तुत है आइस एज (हिम युग) पर एक गहन और भावनात्मक रचना (हिंदी कविता/गद्यांश): या पिघलाना। जीवित रहना
सब ख़त्म होने के बाद भी, बचता है एक स्वर। वो स्वर था—हिम युग का। वो एक दीवार थी
आज भी जब हम ठंड से काँपते हैं, या अकेलेपन में जम जाते हैं— समझ लेना, हम उसी हिम युग के बचे-खुचे किरदार हैं। बस फ़र्क इतना है— अब बर्फ़ बाहर नहीं, भीतर है।
उस युग में जीवित रहना मतलब था— हर साँस को संजोना, हर दिन से मोल-भाव करना। बर्फ़ सिर्फ़ मौसम नहीं थी, वो एक दीवार थी, एक चुप्पी थी, एक अनदेखा युद्ध था, जहाँ हार का मतलब था—गुमनामी।