बाबूराम ने सीखना शुरू किया। उसकी उँगलियाँ, जो कभी रेशम संवारती थीं, अब कीबोर्ड पर चलने लगीं। उसने सीखा कि ऑटो-लूम को कैसे सेट करना है, कैसे डिज़ाइन अपलोड करने हैं।
बाबूराम हँसा, "पर भाई, मेरे कपड़े में जान है। उसकी बुनावट में मेरी आत्मा बसती है।"
बाबूराम अक्सर कहता, "हुनर मरता नहीं, बस थोड़ा सा नया रूप ले लेता है। बस उसे पहचानना आता होना चाहिए।" structural unemployment in hindi
एक साल बाद, वही कंपनी जिसने उसे नौकरी से ठुकराया था, अब उसे "टेक्निकल सुपरवाइजर" के पद पर ले गई। बाबूराम अब पुराने बुनकरों को नई मशीनें सिखाता।
कुछ महीनों बाद, सरकार ने एक स्किल डेवलपमेंट सेंटर खोला। वहाँ कंप्यूटर थे, मॉडर्न मशीनें थीं। पहले बाबूराम ने कहा, "मैं बूढ़ा हो गया हूँ सीखने के लिए।" "हुनर मरता नहीं
लेकिन बाजार ने आत्मा की कीमत नहीं चुकाई। उसने मशीन से बना सस्ता कपड़ा खरीदना शुरू कर दिया। एक-एक करके सारी दुकानें बंद हुईं। करघे बेचे गए। बाबूराम ने हाथ बढ़ाकर कहा, "मुझे काम दो। मैं बुन सकता हूँ।"
एक दिन शहर से एक बड़ी कंपनी के लोग आए। उनके पास था "ऑटो-लूम" - एक ऐसी मशीन जो दिन-रात चलती, कभी थकती नहीं, और एक मिनट में उतना कपड़ा बुन देती जितना बाबूराम पूरे दिन में बुनता। कभी थकती नहीं
कहानी का सीख: